क्या पिता बेटी का वडिलोपार्जित संपत्ति में हिस्सा बेटे को दे सकते हैं? जानिए हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
भारत में संपत्ति से जुड़े विवाद सबसे आम कानूनी मामलों में से एक हैं। आज भी कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या शादी के बाद भी बेटी का पिता की वडिलोपार्जित (पैतृक) संपत्ति पर उतना ही अधिकार होता है जितना बेटे का? और यदि पिता अपनी इच्छा से बेटी का हिस्सा बेटे के नाम कर दें, तो क्या बेटी अपना हक खो देती है?
हाल ही में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने इसी मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता अपनी स्वयं की कमाई से खरीदी गई संपत्ति का मालिक होता है, लेकिन वह वडिलोपार्जित संपत्ति में किसी अन्य सह-वारिस, यानी बेटी या बेटे, के कानूनी अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता।
बेटियों के संपत्ति अधिकार क्या हैं?
पहले हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत बेटियों को वडिलोपार्जित संपत्ति में बेटों के समान अधिकार नहीं था। लेकिन वर्ष 2005 में इस कानून में बड़ा संशोधन किया गया।
इस संशोधन के बाद बेटियों को भी जन्म से ही बेटों के समान सह-उत्तराधिकारी (Coparcener) का दर्जा मिला। इसका अर्थ है कि बेटी का भी वडिलोपार्जित संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना बेटे का। शादी होने के बाद भी उसके इस अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।
क्या पिता बेटी का हिस्सा बेटे को दे सकते हैं?
यदि संपत्ति वडिलोपार्जित (Ancestral Property) है, तो इसका उत्तर है—नहीं।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वडिलोपार्जित संपत्ति में प्रत्येक सह-वारिस का स्वतंत्र और जन्मसिद्ध अधिकार होता है। इसलिए पिता केवल अपने हिस्से के संबंध में ही निर्णय ले सकते हैं। वे बेटी का हिस्सा किसी अन्य व्यक्ति, यहां तक कि अपने बेटे, को नहीं दे सकते।
यदि पिता केवल बेटे के पक्ष में रिलिंक्विशमेंट डीड (Relinquishment Deed) या हक त्याग पत्र तैयार भी कर दें, तब भी उससे बेटी के कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होंगे।
पूरा मामला क्या था?
इस मामले में एक पिता ने कथित रूप से अपनी पहली पत्नी से मिली वडिलोपार्जित संपत्ति को केवल अपने बेटे के नाम करने के लिए एक हक त्याग पत्र (Relinquishment Deed) तैयार किया।
उन्होंने अपनी दूसरी शादी से हुई बेटियों को इस संपत्ति से बाहर रखा। बेटियों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी और कहा कि वडिलोपार्जित संपत्ति में उनका भी समान अधिकार है।
मामला आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वडिलोपार्जित संपत्ति में प्रत्येक सह-मालिक का अपना स्वतंत्र कानूनी अधिकार होता है। कोई भी व्यक्ति दूसरे सह-मालिक का अधिकार छीन नहीं सकता, उसे किसी और को हस्तांतरित नहीं कर सकता और न ही उसे नजरअंदाज कर सकता है।
अदालत ने कहा कि यदि रिलिंक्विशमेंट डीड को वैध भी मान लिया जाए, तब भी उसका प्रभाव केवल पिता के अपने हिस्से तक ही सीमित रहेगा। इससे बेटियों के हिस्से पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वे अपने हिस्से की मांग तथा संपत्ति के बंटवारे का दावा कर सकती हैं।
रिलिंक्विशमेंट डीड क्या होती है?
रिलिंक्विशमेंट डीड (Relinquishment Deed) एक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति में मौजूद हिस्सेदारी या अधिकार स्वेच्छा से छोड़ देता है।
लेकिन कोई भी व्यक्ति केवल अपने हिस्से का त्याग कर सकता है। वह किसी दूसरे सह-वारिस या सह-मालिक के अधिकार का त्याग नहीं कर सकता।
यही सिद्धांत इस मामले में हाई कोर्ट के फैसले का आधार बना।
वडिलोपार्जित संपत्ति पर किसका अधिकार होता है?
मान लीजिए कि दादा, पिता, बेटा और बेटी सभी एक संयुक्त वडिलोपार्जित कृषि भूमि के सह-स्वामी हैं।
जब तक संपत्ति का कानूनी बंटवारा नहीं होता, तब तक कोई भी व्यक्ति किसी विशेष हिस्से पर अपना अलग अधिकार नहीं जता सकता। सभी सह-वारिसों का पूरी संपत्ति पर संयुक्त अधिकार होता है।
ऐसी स्थिति में पिता यह नहीं कह सकते कि पूरी जमीन केवल बेटे की होगी। बेटी का कानूनी अधिकार भी उतना ही मजबूत रहेगा।
स्वयं की कमाई से खरीदी गई संपत्ति का क्या नियम है?
यदि किसी व्यक्ति ने अपनी मेहनत और कमाई से कोई मकान, जमीन या अन्य संपत्ति खरीदी है और वह पूरी तरह उसी के नाम है, तो उसे स्व-अर्जित (Self-Acquired Property) माना जाता है।
ऐसी संपत्ति पर बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होता।
इसलिए पिता अपनी स्व-अर्जित संपत्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी व्यक्ति को दे सकते हैं। वे चाहें तो एक ही बेटे या बेटी को दें, सभी बच्चों में बराबर बांटें या किसी अन्य व्यक्ति के नाम भी कर सकते हैं।
इस प्रकार की संपत्ति को Coparcenary Property नहीं माना जाता।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि बेटियां आज कानून की नजर में बेटों के बराबर हैं। वडिलोपार्जित संपत्ति में उनका अधिकार जन्म से होता है और कोई भी व्यक्ति केवल एक दस्तावेज बनाकर उनका अधिकार समाप्त नहीं कर सकता।
यह फैसला महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को और मजबूत बनाता है तथा हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 की भावना को भी मजबूती देता है।
निष्कर्ष
भारतीय कानून में वडिलोपार्जित संपत्ति और स्व-अर्जित संपत्ति के नियम अलग-अलग हैं।
यदि संपत्ति वडिलोपार्जित है, तो बेटी और बेटे दोनों का उस पर जन्मसिद्ध और समान अधिकार होता है। पिता किसी भी दस्तावेज के माध्यम से बेटी का हिस्सा बेटे को नहीं दे सकते।
वहीं यदि संपत्ति पिता की स्वयं की कमाई से खरीदी गई है, तो उसके वितरण का निर्णय लेने का अधिकार मुख्य रूप से पिता के पास होता है।
इसलिए संपत्ति से जुड़े किसी भी विवाद में सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि संपत्ति वडिलोपार्जित है या स्व-अर्जित। यही बात तय करती है कि किसका उस पर कानूनी अधिकार होगा।

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