पिछले कुछ वर्षों में भारत के बढ़ते कर्ज़ को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। कई रिपोर्ट्स और बहसों में कहा जाता है कि भारत पर कुल कर्ज़ उसकी GDP के क़रीब पहुँच रहा है, खासकर विदेशी देशों जैसे अमेरिका से लिया गया कर्ज़।
लेकिन इसका असली मतलब क्या है?
अगर किसी देश का कर्ज़ उसकी GDP से ज़्यादा हो जाए तो क्या होता है?
और अर्थशास्त्री इसे ख़तरनाक स्थिति क्यों मानते हैं?
इस लेख में हम इस पूरे विषय को समझेंगे।
सबसे पहले समझिए: GDP और राष्ट्रीय कर्ज़
GDP क्या होती है?
GDP (सकल घरेलू उत्पाद) वह कुल मूल्य है जो कोई देश एक साल में वस्तुओं और सेवाओं के ज़रिये कमाता है।
सीधे शब्दों में कहें तो:
GDP देश की सालाना कमाई है।
अगर भारत की GDP ₹100 है, तो इसका मतलब है कि देश एक साल में ₹100 कमाता है।
राष्ट्रीय कर्ज़ क्या होता है?
राष्ट्रीय कर्ज़ वह पैसा है जो सरकार ने उधार लिया होता है।
यह कर्ज़ लिया जाता है:
देश के भीतर (बैंक, संस्थान, RBI)
विदेशों से (अमेरिका, IMF, World Bank आदि)
अगर भारत ₹100 कमाता है और ₹90 उधार ले चुका है, तो कर्ज़ GDP का 90% हो जाता है।
देश कर्ज़ क्यों लेते हैं?
कर्ज़ लेना अपने आप में गलत नहीं है।
जैसे आम लोग:
घर खरीदने
बिज़नेस शुरू करने
पढ़ाई के लिए
लोन लेते हैं, वैसे ही सरकारें कर्ज़ लेती हैं:
सड़कें, रेलवे, एयरपोर्ट बनाने के लिए
रक्षा और सुरक्षा के लिए
गरीब कल्याण योजनाओं के लिए
आर्थिक मंदी में अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए
दुनिया का लगभग हर देश कर्ज़ में है, यहाँ तक कि अमेरिका और जापान जैसे अमीर देश भी।
समस्या तब शुरू होती है जब:
कर्ज़ देश की कमाई से तेज़ी से बढ़ने लगे।
जब कर्ज़ GDP के बराबर या उससे ज़्यादा हो जाए
जब किसी देश का कुल कर्ज़ उसकी GDP के बराबर या उससे अधिक हो जाता है, तो इसका मतलब होता है:
देश पर उतना ही कर्ज़ है जितनी उसकी पूरे साल की कमाई।
यह ठीक वैसा ही है जैसे:
कोई व्यक्ति साल में ₹10 लाख कमाए
लेकिन उस पर ₹10–12 लाख का कर्ज़ हो
ऐसी स्थिति में आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है।
GDP से ज़्यादा कर्ज़ क्यों ख़तरनाक होता है?
1. ब्याज का भारी बोझ
कर्ज़ पर सरकार को हर साल ब्याज देना पड़ता है।
जब कर्ज़ बहुत बढ़ जाता है:
सरकार की बड़ी कमाई सिर्फ़ ब्याज चुकाने में चली जाती है
शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास पर खर्च घट जाता है
फिर सरकार नया कर्ज़ लेकर पुराना ब्याज चुकाती है — इसे Debt Trap (कर्ज़ का जाल) कहते हैं।
2. आर्थिक विकास धीमा पड़ जाता है
ज़्यादा कर्ज़ का मतलब:
विकास कार्यों में कटौती
निजी निवेशकों का भरोसा कम होना
नए उद्योग और नौकरियाँ कम होना
जब विकास धीमा होता है:
टैक्स कलेक्शन घटता है
सरकार पर और दबाव बढ़ता है
3. विदेशी देशों पर निर्भरता बढ़ती है
अगर कर्ज़ ज़्यादातर विदेशी देशों से लिया गया हो:
देश की आर्थिक स्वतंत्रता घटती है
विदेशी दबाव बढ़ता है
नीतियों में समझौता करना पड़ता है
कई देशों को मजबूरी में:
अपने संसाधन बेचने पड़े
सामाजिक खर्च कम करने पड़े
4. रुपये की कीमत गिरने का खतरा
ज़्यादा विदेशी कर्ज़ से:
निवेशक डरते हैं
पैसा बाहर निकालने लगते हैं
इससे:
रुपया कमजोर होता है
पेट्रोल, गैस, मोबाइल, मशीनें महंगी हो जाती हैं
महंगाई बढ़ती है
5. क्रेडिट रेटिंग गिर जाती है
जब कर्ज़ बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है:
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ रेटिंग घटा देती हैं
नए कर्ज़ पर ज़्यादा ब्याज देना पड़ता है
इससे कर्ज़ लेना और मुश्किल हो जाता है।
अगर कर्ज़ नियंत्रण से बाहर चला जाए तो क्या होता है?
इतिहास गवाह है कि ज़्यादा कर्ज़ वाले देशों ने झेला है:
आर्थिक संकट
मुद्रास्फीति (महंगाई)
मुद्रा का पतन
सामाजिक अस्थिरता
कर्ज़ चुकाने में असफलता
एक बार भरोसा टूट जाए, तो वापसी बहुत कठिन होती है।
अमीर देश ज़्यादा कर्ज़ क्यों झेल पाते हैं?
अक्सर लोग पूछते हैं:
“अमेरिका पर तो बहुत ज़्यादा कर्ज़ है, फिर भी वह कैसे चलता है?”
क्योंकि:
उनकी अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत होती है
उनकी मुद्रा वैश्विक होती है
निवेशकों का भरोसा बना रहता है
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए:
ज़्यादा कर्ज़ ज़्यादा जोखिम लाता है
विदेशी झटकों का असर गहरा होता है
आम आदमी पर क्या असर पड़ता है?
ज़्यादा राष्ट्रीय कर्ज़ का बोझ सीधे जनता पर आता है:
टैक्स बढ़ते हैं
सब्सिडी घटती है
सरकारी नौकरियाँ कम होती हैं
महंगाई बढ़ती है
अंततः कर्ज़ आम नागरिक ही चुकाता है।
क्या हर कर्ज़ बुरा है? नहीं।
कर्ज़ तब तक अच्छा है जब:
उससे उत्पादन बढ़े
अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़े
खर्च सोच-समझकर हो
कर्ज़ ख़तरनाक तब होता है जब:
वह सिर्फ़ खर्च चलाने में लगे
ब्याज बोझ बन जाए
सुधारों की जगह उधार लिया जाए
भारत को आगे क्या करना चाहिए?
भारत को चाहिए कि:
टैक्स व्यवस्था मज़बूत करे
बेकार खर्च कम करे
उद्योग और निर्यात बढ़ाए
कर्ज़ का सही उपयोग करे
तेज़ आर्थिक विकास ही कर्ज़ की सबसे बड़ी दवा है।
निष्कर्ष: कर्ज़ साधन है, समाधान नहीं
कर्ज़ आग की तरह है:
सीमित हो तो उपयोगी
ज़्यादा हो तो विनाशकारी
अगर भारत का कर्ज़ GDP से आगे निकलता है और विकास साथ नहीं देता, तो इसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ेगा।
देश को उतना ही कर्ज़ लेना चाहिए, जितना वह आराम से चुका सके।
संतुलित नीतियाँ, अनुशासित खर्च और दीर्घकालिक सोच ही देश को सुरक्षित रख सकती है।

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